रविवार, 17 मई 2015

हरियाणा के 250 गरीब पिछड़े कश्यप परिवार सामूहिक आत्महत्या की कगार पर...!!!

250 कश्यप परिवारों पर पुलिस-प्रशासन ने ढ़ाया कहर


      गत 15 मई, 2015 की सुबह हरियाणा के गुड़गाँव जिले के गाँव फतेहपुर झाड़सा, सैक्टर-47 के 250 गरीब परिवारों पर स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने जमकर कहर ढ़ाया। इन परिवारों का कसूर सिर्फ इतना था कि ये 150 साल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी बसे अपने आशियानों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। ये लोग लंबे समय से जिला प्रशासन, प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार से लगातार गुहार लगा रहे थे कि उन्हें उजाड़ा न जाये और यहीं गुजर-बसर करते रहने दिया जाए, क्योंकि इसके अलावा उनका और कहीं अन्य ठौर-ठिकाना नहीं है। लेकिन, उनकीं गुहार किसी भी स्तर पर नहीं सुनी गई और अंततः गत 15 मई को पुलिसिया बर्बर कार्यवाही के जरिये इन्हें न केवल बेघर कर दिया गया, अपितु अनेक अमानवीय अत्याचार ढ़ाए। केवल इतना ही नहीं, जो भी इन्हें बचाने अथवा सहारा देने आया, उनको भी बख्शा नहीं गया और उनपर भी पुलिस ने जमकर कहर ढ़ाया। जो भी बच्चा, बूढ़ा, जवान, महिला, जज्चा पकड़ में आया, उन्हें मार-मार कर अधमरा कर दिया गया। दर्जनों आँसू गैस के गोले छोड़ गये। सैकड़ों रबड़ के फायद ग्रामीणों पर किये गए। ग्रामीणों के वाहनों को बुरी तरह तोड़ दिया गया और दो ऑटो को आग के हवाले कर दिया। मासूम बच्चों की चीखों का भी बेरहम पुलिसकर्मियों और मौके पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों का कलेजा जरा भी नहीं पसीजा। मात्र तीन दिन पहले बड़े ऑपरेशन से बच्चा जनने वाली प्रसूता को भी नहीं बख्शा गया और उन्हें घसीटकर बाहर खण्डहरों में फेंक दिया गया। पुलिस की इस दमनात्मक कार्यवाही में घायलों को पुलिस हिरासत में लेने के बाद भी भयंकर यातनाएं दी गईं और मानवीय अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। चारों तरफ हाहाकार, आग, धुँआ, चीख-चिल्लाहट, मारा-मारी, मासूम एवं अबोध बच्चों की हृदयविदारक चीखें, पुलिसकर्मियों के डण्डों की कड़कड़ाहट का माहौल कई घण्टों तक बना रहा। जिसने भी इस हृदयविदारक नजारे को देखा, सिहर उठा। 
आप भी देखिये ये पुलिस द्वारा की गई बर्बर कार्यवाही के 
विध्वसंक एवं हृदयविदारक खौफनाक नजारे:-



















देखिये इस बर्बर कार्यवाही के बाद विध्वंसक मंजर 








































































हमदर्दी जताने आई नगर पार्षद निशा सिंह पर भी ढ़ाया जुल्म

    जैसे ही नगर निगम के वार्ड 30 की पार्षद एवं आप पार्टी की नेता  निशा सिंह को गरीब ग्रामीणों पर पुलिस की बर्बर कार्यवाही की सूचना मिली तो वे ग्रामीणों के समर्थन में गाँव फतेहपुर जा पहुँची। यहाँ पर उनकीं पुलिस-प्रशासन से तीखी नांेकझोंक भी हुई। इसी बीच, पुलिस की दमनात्मक कार्यवाही से अपने आशियाने बचाने के लिए ग्रामीणों ने भी विरोध करना शुरू कर दिया। बाद में पुलिस ने हिंसक झड़पों के बाद पार्षद निशा सिंह को ग्रामीणों को पुलिस के खिलाफ उकसाने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया। पुलिस की बर्बर कार्यवाही के बीच, निगम पार्षद गम्भीर रूप से घायल हों गई और उन्हें सिविल अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। इस बीच पुलिस ने निशा सिंह को गिरफ्तार करने की लाख कोशिश की, लेकिन सिविल अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकीं गम्भीर हालत को देखते हुए निशा सिंह को रीलिव नहीं किया। आरडब्लूए पदाधिकारियों और सिटीजन काउंसिल प्रेसिडेंट आर.एस. राठी सहित स्थानीय लोगों एवं समाजसेवियों ने पार्षद निशा सिंह की गिरफ्तारी का सख्त विरोध किया है और यह विरोध निरन्तर उग्र होता जा रहा है। 

क्या है मामला?
    दरअसल, वर्तमान गाँव फतेहपुर (झाड़सा) हरियाणा के गुड़गाँव जिले के सैक्टर 47 में पड़ता है। यह पहले झाड़सा गाँव की पंचायत का हिस्सा था। सदियों पहले यहाँ पर एक बड़ा तालाब था और चारों तरफ घने जंगल खड़े थे। इस जगह पर ‘कश्यप’ जाति (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘धीवर’ कहा जाता है) के बेहद गरीब परिवार आकर रहने लगे। उन्होंने इस तालाब में ‘सिंघाड़े’ उगाकर गुजर-बसर करना शुरू कर दिया। इसके कारण इस जगह का नाम ‘दोखर ढ़ाणी’ भी पड़ गया। इन गरीब परिवारों ने मेहनत-मजदूरी करके अपना जीवन-निर्वाह शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने धीरे-धीरे जंगलों को साफ करके झोंपड़ी डालकर रहने लगे। पंचायत की रहनुमाई में इन गरीब परिवारों ने पिछले 50 से अधिक वर्षों से अपना अलग गाँव फतेहपुर के रूप में विकसित कर लिया था। यहाँ के परिवारों के राशन कार्ड से लेकर तमाम सरकारी कागजात गाँव फतेहपुर (झाड़सा) निवासी के रूप में बनाये गए। इस समय इस गाँव में 250 घर बस चुके थे। ग्रामीणों ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2011 में स्थानीय हुडा अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार दहिया ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि इस गाँव में 207 घर हैं और यह 150 से अधिक वर्षों से बसा हुआ है। ये लोग मजदूरी करके, चाय की दुकानें चलाकर, परचून की दूकानें खोलकर, रेहड़ी लगाकर, ऑटो व स्कूल वैन चलाकर और ठेके की जमीनों पर सब्जी उगाकर बेहद संघर्षमयी जीवन-निर्वाह कर रहे थे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 1996 में इस गाँव (फतेहपुर) की 17 एकड़ जमीन का हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) विभाग ने अधिग्रहण कर लिया था। वर्ष 2005 में इसका मुआवजा घोषित करके खजाने में जमा करा दिया गया था। लेकिन, तत्कालीन ग्राम पंचायत ने यह मुआवजा उठाने से मना कर दिया, क्योंकि यहाँ पर गरीबों का एक पूरा गाँव उजड़ने का सवाल था। बाद में, सरकार ने इस जमीन (गाँव) को नगर निगम में शामिल कर दिया। नगर निगम ने हुडा के घोषित मुआवजे को उठा लिया। इस तरह से येन-प्रकारेण इस जमीन पर अंततः हुडा विभाग का कानूनन मालिकाना हक आ गया। इसके बाद हुडा ने इस जमीन पर सेक्टर-बिल्डरों के सुविधार्थ पक्का सड़क मार्ग विकसित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। इसके लिए हुडा विभाग ने जब भी इन ग्रामीणों को सदियों से बसे अपने आशियाने छोड़कर चले जाने का फरमान सुनाया तो सब ग्रामीणों ने मिलकर कड़ा विरोध किया और इसे उन्हें एक साजिश के तहत बेघर एवं बर्बाद करने का आरोप लगाया। इसके बावजूद, हुडा विभाग ने स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस की सहायता से कड़े कदम उठाते हुए जबरदस्ती गाँव की जमीन पर कब्जा हासिल करने का प्रयास किया। इसके तहत, कई बार ग्रामीणों और पुलिस के बीच खूनी संघर्ष भी हुआ। बताया जाता है कि अब तक 11 बार ऐसी घटनाएं घट चुकीं थीं। इस बीच इन गरीब ग्रामीणों ने स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रदेश और केन्द्र सरकार तक उन्हें उजाड़ने से बचाने की निरन्तर गुहार लगाई, लेकिन हर स्तर पर उनकीं गुहार अनसुनी कर दी गई। इन परिवारों ने स्थानीय नेताओं से लेकर अनेक समाजसेवी संगठनों के समक्ष भी अपना दुःखड़ा रोया, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया और अंततः गत 15 मई को हजारों पुलिस कर्मियों की विध्वंसक और क्रूरतम कार्यवाही के जरिये हुडा विभाग ने इन गरीब ग्रामीणों को उजाड़ने और बेहद खौफनाक सजा देने में कामयाबी हासिल कर ही ली। कुल मिलाकर संक्षिप्त रूप में कहा जाये तो इस शर्मनाक एवं अति निंदनीय घटनाक्रम के पीछे मूल कारण झाड़सा पंचायत की सहमति से तीन-चार पीढ़ी से बसे हुए गरीब परिवारों की झुग्गी-झोपड़ियों को तोड़कर स्थानीय बिल्डरों के लिए आलिशान रास्ता बनाना रहा। 

पुलिस ने दो दर्जने अधिक महिलाओं और पुरूषों को लिया हिरासत में और 200 गरीब ग्रामीणों पर लगाई जान से मारने जैसी गम्भीर धाराएं

    पुलिस ने गाँव फतेहपुर के गरीब ग्रामीणों पर विध्वंसक एवं बर्बर कार्यवाही के बाद मौके पर ही एक दर्जन महिलाओं सहित लगभग 50 लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। इसके साथ ही, निगम पार्षद निशा सिंह, कांग्रेसी नेता प्रदीप जैलदार, एडवोकेट खजान सिंह, मोहन, महेन्द्र, रामकिशन कश्यप सहित 200 अज्ञात लोगों पर कई संगीन धाराओं के तहत केस दर्ज किया है, जिनमें जान से मारने, सरकारी काम में बाधा डालने, सरकारी कर्मचारी से मारपीट करने जैसे अनेक संगीन आरोप लगाए गए हैं। 

मानवाधिकारों का हुआ खुला उल्लंघन!
1. नोटिस देने की औपचारिकता भर की गई!

पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए आसपास के इलाके में छुपे खौफजदा ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उन्हें अपना कीमती सामान और मासूम बच्चों, वृद्धों एवं प्रसूताओं को सुरक्षित जगह पहुँचाने का समय भी नहीं दिया और सुबह उठने से पहले ही हजारों पुलिसकर्मियों की फौज भूखे भेड़ियों की तरह उनपर टूट पड़ी। ग्रामीणों ने बताया कि एक दिन पहले शाम को पाँच बजे के आसपास उनके मकानों पर एक नोटिस चस्पा किया गया, जिस पर न किसी अधिकारी के हस्ताक्षर थे और न ही जगह अथवा तिथि का जिक्र था। इसमें ग्रामीणों को जगह छोड़ने के लिए मात्र 24 घण्टों का समय दिया गया था। लेकिन, नोटिस में दी गई इन 24 घण्टों की यह मोहलत भी नहीं दी गई और सुबह होते ही मात्र 10-12 घण्टों के बाद उन पर बर्बर हमला बोल दिया गया। इसमें मासूम बच्चों, प्रसूताओं, वृद्धाओं और बुजुर्गों को गम्भीर चोंटें आईं।
2. नोटिस के सन्दर्भ में अपील को किया अनसुना!
2500 पुलिसकर्मियों के दस्तों से घिर जाने के बाद जब ग्रामीण नोटिस में दी गई 24 घण्टे की मोहलत पूरा होने की अपील करने के लिए गए तो उन्हें बुरी तरह से पीटा गया और थाने ले जाकर बुरी तरह प्रताड़ित किया गया।

3. एक प्रसूता, जिसने तीन दिन पहले बड़े ऑपरेशन के बाद बच्चे को जन्म दिया था, उसे भी नहीं बख्शा गया। अब यह प्रसूता खुले आसमान के नीचे बाहर खेतों में जमीन पर पड़ी है।
4. पिछले तीन दिन से मासूम बच्चे अपनी माताओं से मिलने के लिए रो रहे हैं। एक दो साल की बिटिया तो अपनी माँ-माँ कहकर बेसुध हुई जा रही है। इस बच्ची की माँ को पुलिस ने हिरासत मंे लिया हुआ है। 

5. पुलिस की विध्वसंक और बर्बर कार्यवाही के दौरान घायल हुए लोगों का कोई उपचार नहीं करवाया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जो भी व्यक्ति उपचार करवाने जाता है तो पुलिस उन्हें दबोच लेती है और जेल में डालकर बुरी तरह प्रताड़ित करती है।

6. पुलिस की दमनात्मक कार्यवाही के उपरांत उजड़ चुके घायल लोगों के पास न पैसा है और न खाने के लिए आटा। सब बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भूखे-प्यासे मर रहे हैं और कहीं पुलिस उन्हें गिरफ्तार न कर ले, इसके लिए आसपास के इलाकों में खौफजदा होकर छुपने को विवश हैं। कई लोगों की हालत गम्भीर हो चुकी हैं।


7. मासूम बच्चों की पढ़ाई चौपट हो चली है। उनके कपड़े, किताबें आदि सब सामान हुडा विभाग ने मलबे में दबा दिये हैं। बच्चों को रोटी तक नसीब नहीं हैं तो स्कूल कैसे जा पाएंगे?
8. सभी ग्रामीणों के परिवार एक-दूसरे से बिछुड़े हुए हैं। किसी को भी एक-दूसरे की खैर-खबर नहीं है।


9. हुडा विभाग द्वारा जेसीबी मशीनों के जरिए सारे मकान जमींदोज कर दिये गए हैं। इस दौरान रूपये, आभूषण और सभी घरेलू उपकरण सरेआम लूट लिये गए और बाकी को मलबे में दबा दिया गया। 
10. ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने किसी व्यक्ति के माध्यम से मानवाधिकार आयोग तक अपना दर्द पहुँचाया है, लेकिन इसके बावजूद उनकीं सुध कोई नहीं लेने आया है।
अदालत के स्वतः संज्ञान की राह तक रहे ग्रामीण!
    गाँव फतेहपुर के ग्रामीण अब भी न्याय माँग रहे हैं और उन पर हुए बेइंतहा जुल्मों और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान लेने की राह तक रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि मानवाधिकार आयोग अथवा राष्ट्रपति महोदय एवं अदालतें स्वतः संज्ञान लेंगीं और उन्हें न्याय देंगीं। 

क्या हैं वर्तमान हालात?
    गाँव फतेहपुर के गरीब ग्रामीण पुलिस की बर्बर कार्यवाही के बाद न केवल पूरी तरह उजड़ चुके हैं, बल्कि भूख, प्यास और पुलिस के खौफ से बिल्कुल टूट चुके हैं। उनका धैर्य निरन्तर टूटता चला जा रहा है और स्थानीय प्रशासन एवं प्रदेश सरकार के साथ-साथ केन्द्र की मोदी सरकार के प्रति भी उनका गुस्सा सभी हदें पार करता चला जा रहा है। इन सब हालातों के बीच पीड़ित 250 परिवार सामूहिक आत्महत्या की कगार पर पहुँच रहे हैं। यदि प्रशासन, सरकार एवं समाजसेवी संगठनों ने उन्हें सहारा नहीं दिया तो पीड़ित ग्रामीण बेहद गम्भीर कदम उठाने को मजबूर हो सकते हैं। इसके साथ ही कई सामाजिक संगठनों के उग्र होने की भी पूर्ण संभावना है।  इन सब हालातों को देखते हुए हालात और भी गम्भीर हो सकते हैं।

राष्ट्रपति भवन के बाहर सामूहिक आत्मदाह 
कर सकते हैं पीड़ित परिवार!
    बातचीत के दौरान पीड़ित लोगों ने सरकार एवं प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है और उन्हें न्याय देने, पुनः बसाने और उन्हें हुये नुकसान की भरपाई करवाने की मार्मिक अपील की है। यदि ऐसा नहीं होता है तो वे राष्ट्रपति भवन के आगे जाकर बीवी-बच्चों के साथ सामूहिक आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए भी मजबूर हो सकते हैं।
इसी सन्दर्भ में सुनिए इन पीड़ितों का दुःख-दर्द:







नोट : यह रिपोर्ट 16 मई, 2015 को मौके पर पहुंचकर और पीड़ितों के दुःख -दर्द साँझा करने के उपरांत मिली जानकारियों के आधार पर तैयार की गयी है. 
- राजेश कश्यप 
स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं समाजसेवी

मंगलवार, 12 मई 2015

विशेष रिपोर्ट : ‘असंवैधानिक जाट आरक्षण’ के विरोध में दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर महाविशाल धरना-प्रदर्शन


‘असंवैधानिक जाट आरक्षण’ के विरोध में दिनांक 7 मई, 2015 को कुरूक्षेत्र (हरियाणा) के भाजपा सांसद श्री राजकुमार सैनी के नेतृत्व में दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर समस्त ‘पिछड़ा वर्ग कोआर्डिनेशन कमेटी’ के बैनर तले विशाल धरना-प्रदर्शन हुआ। 

इस प्रदर्शन में ओबीसी वर्ग के लोगों का विशाल जनसमूह उमड़ पड़ा। इसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और नौजवान आदि हर वर्ग के लोग शामिल थे।

इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन में ओबीसी समाज के लोग बड़ी दूर-दूर से आये थे। गाँव टिटौली, जिला रोहतक (हरियाणा) से बसों में सवार होकर सुरेश जांगड़ा, देवेन्द्र काला, राजपाल जांगड़ा, बलबीर सैनी, दया सिंह, प्रकाश, मदन, रणबीर, प्रकाश, आनंद, बलबीर, राजेश कश्यप (जिला प्रधान, हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक) आदि पिछड़ा वर्ग के सैंकड़ों लोग सांसद श्री राजकुमार सैनी के आह्वान पर जन्तर-मन्तर पहुँचे।


जन्तर-मन्तर पर अपार भीड़ देखकर जहां सांसद राजकुमार सैनी गदगद हो उठे, वहीं मीडिया के लोग भी अचम्भित हो गये।

इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन के दौरान जन्तर-मन्तर पर जिधर देखो, उधर ही जनसैलाब उमड़ता दिखाई दे रहा था।
यह महाविशाल धरना-प्रदर्शन जाटों द्वारा ओबीसी सूची में शामिल होने के लिए असंवैधानिक एवं ओछे हथकण्डे अपनाने के विरोध में आयोजित किया गया था। ओबीसी के लोगों को अपने निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षित कोटे में जाटों को शामिल करना किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है। जाटों को इस कोटे के अलावा आरक्षण निर्धारित किये जाने से ओबीसी के लोगों को कोई ऐतराज नहीं है।

इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन के दौरान ओबीसी समाज ने सांसद राजकुमार सैनी को सम्मान की प्रतीक पगड़ी पहनाई।
सांसद राजकुमार सैनी ने मंच से बेहद ओजस्वी भाषण दिया और एक बार फिर जाटों को ओबीसी कोटे में शामिल होने की असंवैधानिक नापाक कोशिशों को नाकाम करने का संकल्प दोहराया।

इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन के दौरान ओबीसी के लोगों ने अर्धनग्न होकर अपना रोष जताया और गगनभेदी नारों के बीच अपना विरोध दर्ज कराया।

इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन के बाद सांसद श्री राजकुमार सैनी के नेतृत्व में अपार जनसमूह के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ज्ञापन देने के लिए ओबीसी संगठनों ने पैदल मार्च किया।
गगनभेदी नारों के बीच ज्ञापन देने जा रहे सांसद श्री राजकुमार सैनी और सभी ओबीसी संगठनों को पुलिस ने बैरीकेड लगाकर रोक लिया और धारा 144 का हवाला देते हुए सिर्फ प्रतिनिधियों को ज्ञापन देने के लिए आगे जाने की अनुमति दी। इस दौरान ओबीसी समाज के लोग अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर ही जमकर बैठ गए।



ज्ञापन देने जाने से पहले सांसद श्री राजकुमार सैनी ने अपार जनसमूह का हाथ जोड़कर आभार व्यक्त किया और अपने-अपने गंतव्य को लौट जाने का आग्रह किया।



हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक के जिला प्रधान राजेश कश्यप ने जंतर-मंतर पर आयोजित इस महाविशाल धरना-प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लिया।




ज्ंतर-मंतर, दिल्ली में आयोजित महाविशाल धरना-प्रदर्शन के दौरान कुछ झलक ओबीसी लोगों के जोश और जुनून कीं।

(नोट: सभी फोटो एवं विडियो राजेश कश्यप, जिला प्रधान, हरियाणा कश्यप राजपूत सभा, रोहतक द्वारा शूट किये गए हैं।)

शुक्रवार, 8 मई 2015

Helmet Award


       हैलमेट पहना होने के कारण आज विश्व रैडक्रास दिवस (8 मई) को महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के प्रवेशद्वार पर रैडक्रास एवं विश्वविद्यालय के सदस्यों ने ‘गुलाब’ का फूल देकर मुझे सम्मानित किया। आज तक हैलमेट न पहनने वालों को फूल देकर शर्मिन्दा किया जाता रहा है। लेकिन, आज हैलमेट पहनने वालों को सम्मानित करने का अभिनव प्रयास, निःसन्देह दिल को छू गया। इसके लिए रैडक्रास रोहतक और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय प्रशासन बधाई एवं साधुवाद का पात्र है। यह सकारात्मक मुहिम बहुत बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन की प्रतीक बन सकती है। तहेदिल से आपका आभार और शुक्रिया है।
-राजेश कश्यप, टिटौली (टिटौली) रोहतक।

रविवार, 3 मई 2015

‘प्रज्ञा साहित्य सम्मान-2015’

मुख्य अतिथि श्री मनीष ग्रोवर, रोहतक विधायक के हाथों सम्मान हासिल करते हुए राजेश कश्यप।
        मेरा परमसौभाग्य है कि आज रोहतक (हरियाणा) की शीर्ष 60 विशिष्ट एवं प्रख्यात साहित्यकार विभूतियों के साथ ‘प्रज्ञा साहित्य सम्मान-2015’ हासिल करने का गौरव मिला। यह विशिष्ट सम्मान-समारोह ‘प्रज्ञा साहित्यिक मंच, हरियाणा’ के तत्वाधान में माता ‘इन्द्रा स्वप्न’ की प्रेरणा से आयोजित किया गया था। निःसन्देह, यह मेरे लिये गर्व एवं गौरव का ऐतिहासिक और चिरस्मरणीय पल रहेगा। मैं इस अमूल्य सम्मान एवं आशीर्वाद के लिए मंच के अध्यक्ष श्री मुधकांत, सचिव श्री हरनाम शर्मा और संयोजक श्री मंजूल पालीवाल जी का तहेदिल से आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। 

मुख्य अतिथि श्री मनीष ग्रोवर, रोहतक विधायक एवं सम्मानित साहित्यकारों के साथ राजेश कश्यप।
     इसके साथ ही मैं ‘प्रज्ञा साहित्यिक मंच’ के सभी सदस्यों और जिला रोहतक की उन महान विशिष्ट विभूतियों का भी तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ, जिन्होंने मुझे अपने बीच बैठने का सौभाग्य दिया। मैं समारोह के मुख्य अतिथि माननीय विधायक श्री मनीष गौरव, वरिष्ठ अतिथि वयोवृद्ध साहित्यकार डॉ. हरिश्चन्द्र वर्मा और विशिष्ट अतिथि डॉ. श्याम सखा श्याम, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी का विशेष तौरपर आभारी हूँ, जिन्होंने अपने शुभ-कर कमलों से आशीर्वाद दिया। मैं हरियाणा साहित्य मनीषी श्री रामफल चहल जी का तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मुझे चद्दर व पटका पहनाकर ‘प्रज्ञा साहित्य सम्मान-2015’ का साक्षी बनाया। आप सब मित्रों का भी मैं बेहद धन्यवादी हूँ, जो मुझे निरन्तर प्रेरित करते रहते हैं और हौंसला बढ़ाते रहते हैं। मैं राजेश कश्यप आप सबका तहेदिल से पुनः आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। अपना स्नेह, आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन बनाये रखियेगा। शुक्रिया।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

जानिए ‘मजदूर दिवस’ की महत्ता और उसका इतिहास

1 मई/अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस विशेष
मई दिवस : 
May Diwas Collage by Rajesh Kashyap

जानिए ‘मजदूर दिवस’ की महत्ता और उसका इतिहास 
- राजेश कश्यप



                          एक मई अर्थात अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस। यह दिवस विशेषकर मजदूरों के लिए अपनी एकता प्रदर्शित करने का दिन माना जाता है। मजदूर लोग अपने अधिकारों एवं उनकी रक्षा को लेकर प्रदर्शन करते हैं। अगर आज के परिदृश्य में यदि हम मजदूर दिवस की महत्ता का आकलन करें तो पाएंगे कि इस दिवस की महत्ता पहले से भी कहीं ज्यादा हो गई है। वैश्विक पटल पर एक बार फिर पूंजीवाद का बोलबाला सिर चढ़कर बोल रहा है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने सदैव गरीब मजदूरों का शोषण किया है, उनके अधिकारों पर कुठाराघात किया है और उन्हें जिन्दगी के उस पेचीदा मोड़ पर पहुंचाया है, जहां वह या तो आत्महत्या करने के लिए विवश होता है, या फिर उसे अपनी नियति को कोसते हुए भूखा-नंगा रहना पड़ता है।
                           सन् 1750 के आसपास यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई। उसके परिणामस्वरूप मजदूरों की स्थिति अत्यन्त दयनीय होती चली गई। मजदूरों से लगातार 12-12 और 18-18 घण्टों तक काम लिया जाता, न कोई अवकाश की सुविधा और न दुर्घटना का कोई मुआवजा। ऐसे ही अनेक ऐसे मूल कारण रहे, जिन्होंने मजदूरों की सहनशक्ति की सभी हदों को चकनाचूर कर डाला। यूरोप की औद्योगिक क्रांति के अलावा अमेरिका, रूस, आदि विकसित देशों में भी बड़ी-बड़ी क्रांतियां हुईं और उन सबके पीछे मजदूरों का हक मांगने का मूल मकसद रहा। 
                         अमेरिका में उन्नीसवीं सदी की शुरूआत में ही मजदूरों ने ‘सूर्योदय से सूर्यास्त’ तक काम करने का विरोध करना शुरू कर दिया था। जब सन् 1806 में फिलाडेल्फिया के मोचियों ने ऐतिहासिक हड़ताल की तो अमेरिका सरकार ने साजिशन हड़तालियों पर मुकदमे चलाए। तब इस तथ्य का खुलासा हुआ कि मजदूरों से 19-20 घण्टे बड़ी बेदर्दी से काम लिया जाता है। उन्नीसवीं सदी के दूसरे व तीसरे दशक में तो मजदूरों में अपने हकों की लड़ाई के लिए खूब जागरूकता आ चुकी थी। इस दौरान एक ‘मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फिलाडेल्फिया’ नामक श्रमिक संगठन का गठन भी हो चुका था। यह संगठन सामान्यतः दुनिया की पहली टेªड युनियन मानी जाती है। इस युनियन के तत्वाधान में मजदूरों ने वर्ष 1827 में एक बड़ी हड़ताल की और काम के घण्टे घटाकर दस रखने की मांग की। इसके बाद इस माँग ने एक बहुत बड़े आन्दोलन का रूप ले लिया, जोकि कई वर्ष तक चला। बाद में, वॉन ब्यूरेन की संघीय सरकार को इस मांग पर अपनी मुहर लगाने को विवश होना ही पड़ा। 
                          इस सफलता ने मजदूरों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। कई नई युनियनें ‘मोल्डर्स यूनियन’, ‘मेकिनिस्ट्स युनियन’ आदि अस्तित्व में आईं और उनका दायरा बढ़ता चला गया। कुछ दशकों बाद आस्टेªलिया के मजदूरों ने संगठित होकर ‘आठ घण्टे काम’ और ‘आठ घण्टे आराम’ के नारे के साथ संघर्ष शुरू कर दिया। इसी तर्ज पर अमेरिका में भी मजदूरों ने अगस्त, 1866 में स्थापित राष्ट्रीय श्रम संगठन ‘नेशनल लेबर यूनियन’ के बैनर तले ‘काम के घण्टे आठ करो’ आन्दोलन शुरू कर दिया। वर्ष 1868 में इस मांग के ही ठीक अनुरूप एक कानून अमेरिकी कांग्रेस ने पास कर दिया। अपनी मांगों को लेकर कई श्रम संगठनों ‘नाइट्स ऑफ लेबर’, ‘अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर’ आदि ने जमकर हड़तालों का सिलसिला जारी रखा। उन्नीसवीं सदी के आठवें व नौंवे दशक में हड़तालों की बाढ़ सी आ गई थी। 
                          ‘मई दिवस’ मनाने की शुरूआत दूसरे इंटरनेशनल द्वारा सन् 1886 में हेमार्केट घटना के बाद हुई। दरअसल, शिकागों के इलिनोइस (संयुक्त राज्य अमेरिका) में तीन दिवसीय हड़ताल का आयोजन किया गया था। इसमें 80,000 से अधिक आम मजदूरों, कारीगरों, व्यापारियों और अप्रवासी लोगों ने बढ़चढ़कर भाग लिया। हड़ताल के तीसरे दिन पुलिस ने मेकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी संयंत्र में घुसकर शांतिपूर्वक हड़ताल कर रहे मजदूरों पर फायरिंग कर दी, जिसमें संयंत्र के छह मजदूर मारे गए और सैंकड़ों मजदूर बुरी तरह घायल हो गए। इस घटना के विरोध में अगले दिन 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में एक रैली का आयोजन किया गया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए जैसे ही आगे बढ़ी, एक अज्ञात हमलावर ने पुलिस के दल पर बम फेंक दिया। इस विस्फोट में एक सिपाही की मौत हो गई। इसके बाद मजदूरों और पुलिस में सीधा खूनी टकराव हो गया। इस टकराव में सात पुलिसकर्मी और चार मजदूर मारे गए तथा दर्जनों घायल हो गए।
                           इस घटना के बाद कई मजदूर नेताओं पर मुकदमें चलाए गए। अंत में न्यायाधीश श्री गैरी ने 11 नवम्बर, 1887 को कंपकंपाती और लड़खड़ाती आवाज में चार मजदूर नेताओं स्पाइडर, फिशर, एंजेल तथा पारसन्स को मौत और अन्य कई लोगों को लंबी अवधि की कारावास की सजा सुनाई। इस ऐतिहासिक घटना को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1888 में अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर ने इसे मजदूरों के बलिदान को स्मरण करने और अपनी एकता को प्रदर्शित करते हुए अपनी आवाज बुलन्द करने के लिए प्रत्येक वर्ष 1 मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इसके साथ ही 14 जुलाई, 1888 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में विश्व के समाजवादी लोग भारी संख्या में एकत्रित हुए और अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी संगठन (दूसरे इंटरनेशनल) की नींव रखी। इस अवसर पर संयुक्त प्रस्ताव पारित करके विश्वभर के मजदूरों के लिए कार्य की अधिकतम अवधि को आठ घंटे तक सीमित करने की माँग की गई और संपूर्ण विश्व में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 
                          ‘मई दिवस’ पर कई जोशिले नारों ने वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थित दर्ज करवाई। समाचार पत्र और पत्रिकाओं में भी मई दिवस पर विचारोत्तेजक सामग्रियां प्रकाशित हुईं। ‘मई दिवस’ के सन्दर्भ में ‘वर्कर’ नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में चार्ल्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा, ‘‘’मई-दिवस, वह दिन जो पूंजीपतियों के दिल में डर और मजदूरों के दिलों में आशा पैदा करता है।’ इसी पत्र के एक अन्य ‘मई दिवस विशेषांक’ में यूजीन वी. डेब्स ने लिखा, ‘यह सबसे पहला और एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय दिवस है। यह मजदूर के सरोकार रखता है और क्रांति को समर्पित है।’
                          ‘मई दिवस’ को इंग्लैण्ड में पहली बार वर्ष 1890 में मनाया गया। इसके बाद धीरे-धीरे सभी देशों में प्रथम मई को ‘मजदूर दिवस’ अर्थात ‘मई दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। वैसे मई दिवस का प्रथम इश्तिहार रूस की जेल में ब्लाडीमीर इलियच उलियानोव लेनिन ने वर्ष 1886 में ही लिख दिया था। भारत में मई दिवस मनाने की शुरूआत वर्ष 1923 से, चीन में वर्ष 1924 से और स्वतंत्र वियतनाम में वर्ष 1975 से हुई। वर्ष 1917 मजदूर संघर्ष का स्वर्णिम दौर रहा। इस वर्ष रूस में पहली बार सशक्त मजदूर शक्ति ने पंूजीपतियों की सत्ता को उखाड़ फेंका और अपने मसीहा लेनिन के नेतृत्व में ‘बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी’ की सर्वहारा राज्यसत्ता की स्थापना की। विश्व इतिहास की यह महान घटना ‘अक्तूबर क्रांति’ के नाम से जानी जाती है। 
                         वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) के प्रथम अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया गया कि सभी औद्योगिक संगठनों में कार्यावधि अधिक-से-अधिक आठ घंटे निर्धारित हो। इसके साथ ही श्रम संबंधी अन्य अनेक शर्तों को भी कलमबद्ध किया गया। विश्व के अधिकतर देशों ने इन शर्तों को स्वीकार करते हुए उन्हें लागू भी कर दिया। आगे चलकर वर्ष 1935 में इसी संगठन ने आठ घंटे की अवधि को घटाकर सात घंटे की अवधि का प्रस्ताव पारित करते हुए यह भी कहा कि एक सप्ताह में किसी भी मजदूर से 40 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाना चाहिए। इस प्रस्ताव का अनुसरण आज भी विश्व के कई विकसित एवं विकासशील देशों में हो रहा है। 
                          इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से लड़ने एवं अपने अधिकारों को पाने और उनकी सुरक्षा करने के लिए मजदूरों को जागरूक एवं संगठित करने का बहुत बड़ा श्रेय साम्यवाद के जनक कार्ल मार्क्स को जाता है। कार्ल मार्क्स ने समस्त मजदूर-शक्ति को एक होने एवं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना सिखाया था। कार्ल मार्क्स ने जो भी सिद्धान्त बनाए, सब पूंजीवादी अर्थव्यस्था का विरोध करने एवं मजदूरों की दशा सुधारने के लिए बनाए थे।
                           कार्ल मार्क्स का पहला उद्देश्य श्रमिकों के शोषण, उनके उत्पीड़न तथा उन पर होने वाले अत्याचारों का कड़ा विरोध करना था। कार्ल मार्क्स का दूसरा मुख्य उद्देश्य श्रमिकों की एकता तथा संगठन का निर्माण करना था। उनका यह उद्देश्य भी बखूबी फलीभूत हुआ और सभी देशों में श्रमिकों एवं किसानों के अपने संगठन निर्मित हुए। ये सब संगठन कार्ल मार्क्स के नारे, ‘‘दुनिया के श्रमिकों एक हो जाओ’’ ने ही बनाए। इस नारे के साथ कार्ल मार्क्स मजदूरों को ललकारते हुए कहते थे कि ‘‘एक होने पर तुम्हारी कोई हानि नहीं होगी, उलटे, तुम दासता की जंजीरों से मुक्त हो जाओगे’’।
                          कार्ल मार्क्स चाहते थे कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित हो, जिसमें लोगों को आर्थिक समानता का अधिकार हो और जिसमें उन्हें सामाजिक न्याय मिले। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को कार्ल मार्क्स समाज व श्रमिक दोनों के लिए अभिशाप मानते थे। वे तो हिंसा का सहारा लेकर पूंजीवाद के विरूद्ध लड़ने का भी समर्थन करते थे। इस संघर्ष के दौरान उनकीं प्रमुख चेतावनी होती थी कि वे पूंजीवाद के विरूद्ध डटकर लड़ें, लेकिन आपस में निजी स्वार्थपूर्ति के लिए कदापि नहीं।                           कार्ल मार्क्स ने मजदूरों को अपनी हालत सुधारने का जो सूत्र ‘संगठित बनो व अधिकारों के लिए संघर्ष करो’ दिया था, वह आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है। लेकिन, बड़ी विडम्बना का विषय है कि यह नारा आज ऐसे कुचक्र में फंसा हुआ है, जिसमें संगठन के नाम पर निजी स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाती हैं और अधिकारों के संघर्ष का सौदा किया जाता है। मजदूर लोग अपनी रोजी-रोटी को दांव पर लगाकर एकता का प्रदर्शन करते हैं और हड़ताल करके सड़कों पर उतर आते हैं, लेकिन, संगठनों के नेता निजी स्वार्थपूर्ति के चलते राजनेताओं व पूंजीपतियों के हाथों अपना दीन-ईमान बेच देते हैं। परिणामस्वरूप आम मजदूरों के अधिकारों का सुरक्षा कवच आसानी से छिन्न-भिन्न हो जाता है। वास्तविक हकीकत तो यह है कि आजकल हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि मजदूर वर्ग मालिक (पूंजीपति वर्ग) व सरकार के रहमोकर्म पर निर्भर हो चुका है। बेहतर तो यही होगा कि पूंजीपति लोग व सरकार स्वयं ही मजदूरों के हितों का ख्याल रखें, वरना कार्ल मार्क्स के एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, ‘‘एक समय ऐसा जरूर आता है, जब मजदूर वर्ग एकाएक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था एवं प्रवृत्ति वालों के लिए विनाशक शक्ति बन जाता है।’’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)